सोमवार, 1 अक्टूबर 2012

नीँद

अब आंखे  अक्सर उसे बंद करने से इंकार कर देती है,
पलकों के दरवाज़े से बाहर ,
दहलीज पर पड़े सोफे पर बैठना पड़ता है उसे।
बहुत देर तक इंतजार करना पड़ता है,
बचपन में बहुत जल्दी से आ जाती थी,
झट से नन्ही पलकों समा जाती थी।
अब भटकती  रहती है बिस्तर पर ,
न जाने कितनी करवाते बदलती है,
तकिये को सीने से लगाये हुए।
इक्छावों का पंछी उड़ता है स्वप्नों के अनंत आकाश में,
फिर सहसा गिर पड़ता है पखे से काटकर,
लहूलुहान बिस्तर पर।
अब वो मेरा दामन  पकड़कर रोती है ,
पलकों का दरवाज़ा बंद होता है और मुझे नींद आ जाती है। 

शनिवार, 5 मार्च 2011

तुम्हारी आँखों का.....

तुम्हारी आँखों का -मुझको ,समंदर  याद आता है,
लब  से छु गये थे  लब, वो मंजर याद आता है.
वो मंजर याद  आता है, मै सब कुछ भूल जाता हूँ ,
तुम्ही को गा रहा हूँ  मै,तुम्ही को गुनगुनाता हूँ.

शुक्रवार, 26 नवंबर 2010

कविता उनसे कह देना

कॉलेज के पहले दिन से ,नजरो में वो आई थी,
ना जाने इन कुडिओं में ,क्यों वो ही मुझको भायी थी.
छिप- छिप कर देखा करता, इन नजरो  की कोरो से ,
दिल उन्हें छिपा लिया ,धड़कन  के   द्वारो    से.
यह दिल उनका ही आशियाना है, ऐ कविता उनसे कह देना..

इस लुका छिपी के खेल में धीरे- धीरे मेल हुआ,
अपना उसे समझ बैठा ,ना ख़त लिखा ,ना ई-मेल हुआ.
प्यार वो मुझसे करती है ,नहीं उसे दर्शाती है,
सच पूछो वो ज़िद्दी, है इसलिए मुझे सताती है ,
सपनो में आती हो तुम, ऐ कविता उनसे कह देना.

शुक्रवार, 19 नवंबर 2010

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अब तक मैंने गीत विरह के गाये थे,
अब मै राग प्रेम का छेडूंगा,
अब तक मैंने भवरो के संग गुंजार करूँगा,
अब मै अलियों -कलियों के संग खेलूँगा.

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बुधवार, 17 नवंबर 2010

प्रेम पेटिका

              
                            (पहली)



लाल रोशनी , धीमी -आहट  ,रातो का भी क्या कहना,
रात वो आधी , बात आधूरी ,वादों का भी क्या कहना.

धनुषाकृत भौ, लम्बे केश , ग्रीवा का भी क्या कहना ,
आखों में सुरमा , माथे पर बिंदिया , होठो का भी क्या कहना .

चाँद सा टुकड़ा , भोला मुखड़ा , मुखड़े का भी क्या कहना,
उनकी अदाए , उनके इसारे ,धड़कन का भी क्या कहना.







मंगलवार, 16 नवंबर 2010

जाड़े के दिन एक राज्यिया ....

जाड़े के दिन आवन बयये,
हमने सोची एक बतयिया,
चलो ख़रीदे एक राज्यिया  .

ठाट -बाट से गएँ बजरिया,
सोनुवा के संग गयन बजरिया,
और खरीदी एक राज्यिया  .

वहिका संग हम लायें भइय्या ,
बड़े मजे ते सोयन भईय्या,
ई है हमरी एक राज्यिया   .


इहते प्यार बहुत है हमका ,
रिश्ते मा  ना लगे सैया,
हमरी प्यारी एक राज्यिया   .

बहार से तो ठंडी बहुते,
अंदर गरम बहुत रजिय्या,
हमरी  न्यारी एक राज्यिया  .

प्यार -मेल के मस्त खेल मा.
आठ बजे तक सोयें भईय्या,
ऐसी हमरी एक  राज्यिया  .

देर हो गयी कॉलेज  कहिय्या ,
डाट पड़ी फिर हमका भईय्या,
ऐसी हमरी एक राज्यिया  .

पाहिले थोडा गुस्सा भायें
फिर घुसि गएँ वही राज्यिया  ,
जाड़े के दिन एक राज्यिया  .

सोमवार, 15 नवंबर 2010

जब मेरे घर नानी आई .......

जब मेरे घर नानी आई,
थी  थाली भर खोया लाई,
तब हम सबने चीख लगाई,
मम्मी अब तो बने मिठाई .

मम्मी ने पहले ना माना,
पर चल सका ना एक बहाना,
मम्मी अब थी गयी रसोई ,
और बनाने लगी मिठाई .

डब्बू,पिंटू ,बब्लू आये ,
डाली ,कमला ,बबली आयी,
रसगुल्ला , छेना और बर्फी ,
मीठी - गुझिया- रसमलाई.

अब हम सब है मौज मानते,
नाच -नाचते गाना -गाते ,
मम्मी ने आवाज लगाई,
बच्चों है बन गयी मिठाई .

नटखट दीप का रोना जरी,
मुझे मिठाई  खनी सारी,
मम्मी ने उसे पास बुलाया ,
फिर धीरे से था समझाया.

जो होते है अच्छे बच्चे ,
जो होते मन के सच्चे ,
खाते है मिल -बाट मिठाई ,
जब मेरे घर नानी आयी.