शनिवार, 13 नवंबर 2010

हाँ तुम !

तुम्हारे नील -झील से नैन ,
और लहराते काले बाल,
तुम्हारी मन-मोहक मुस्कान ,
हमारी आँखों का व्यवहार .

तुम्हारे नयन -नक्श विशाल ,
तिस पर अरे ओढ़नी  लाल,
 हवा से उड़े ओढ़नी लाल,
हवा का बन जाऊ , मै काल.

तुम्हारे नील -झील से नैन ,
और लहराते काले बाल.

पंडित जी कि हुई पिटाई

पंडित जी हाँ चोटी वाले,
लम्बा कुर्ता, धोती वाले,
पंडित जी चमड़ी के गोरे,
बुद्धि में थे कागज कोरे .

पंडित जी के सर पर चुटिया,
संग अपने रखते थे लुटिया,
पंडित जी संग मेरे रहते,
गर्ल- वर्ल की बाते करते.

पंडित जी ने व्यथा बताई,
एक कन्या की कथा सुनाई,
पंडित जी ने दाव लगाया,
उस कन्या को मुक्षे दिखाया.

****************************

कन्या मालिक की बेटी थी,
पहले माले पर रहती थी ,
पंडित जी ने प्रीत जताई,
कन्या मंद- मंद मुस्काई.

कन्या सीढ़ी से जब आई,
पंडित जी ने बात बनाई ,
कन्या सच  में वंडर थी,
क्यूट और अतिसुंदर थी.

कन्या कॉलेज में पढ़ती थी,
बाते इंग्लिश में करती थी,
कन्या के संग एक फ्रंडा  था,
सकल से दिखता गैंडा था.

**************************

(पंडित जी  प्यार में गिर चुके थे. उन्हें सहारे कि जरुरत थी .
मैंने कंहा पंडित जी आप स्मार्ट है . धोती कुर्ता और चुटिया
 में खूब  फबते है, आप के अंदर भारतीयता है , नातिकता है,
 पर आधुनिकता नहीं है.आप को आधुनिक बनना होगा.  )

पंडित जी ने चोटी बदली ,
कुर्ता और लगोंटी बदली ,
पंडित जी अब जींस- पैंट में,
चलते जैसे चले रैम्प में.

पंडित जी ने ऐनक पहनी,
अब दिल कि बाते है कहनी,
पंडित जी ने पुष्प मंगाया,
लव- लैटर  मुझ से लिखवाया.

पंडित जी थे बड़े पुजारी,
जप राधा -स्वामी कृष्ण -मुरारी,
पंडित जी अब सुबह -सवेरे ,
नए प्यार में हाथ पसारे.

**************************

(अब पंडित जी ,अपनी दिल की बात उस कन्या से कहते है.)

कन्या कटी मटकती आई,
पंडित जी क्या हुई सगाई ,
पंडित जी के होस उड़ गए,
कन्या के जो कदम बढ़ गए.

पंडित जी कहने को ठानी,
कन्या तेरी मस्त जवानी,
कन्या तेरा हूँ  दीवाना ,
आ मेरी बाहों में आना .

कन्या ने तब चीख लगाई ,
पंडित जी की हुई पिटाई.

गुरुवार, 3 जून 2010

मधुशाला

Add caption
 मदिरालय  के  दरवाजे पर खड़ी    हुई  - साकी बाला,
अपने मादक   नैनों  से पिला रही- मादक हाला.
भरी हुई मधु कि बोतल, औ  भरा हुवा मधु का प्याला,
मुक्षको प्रेमी बना रही थी , मधुरम - मधुरुस -मधुशाला.

प्याले  का  आलिंगन  कर ,    अधरों को  चूमे  मधुशाला ,
हर दिन - हर पल डोलू हर पल, लिए हुए मधु का प्याला .
तन्द्रा   - निंद्रा रात्रि और दिन,  सपनो में भी मधुशाला,
मै तो उसका बन बैठा  था,  प्रेमी- पागल- मतवाला .

अपने पुरखो की समाधी पर, बनवाई एक मधुशाला  , 
नाते- रिश्ते बंधन भूला , याद रहा मधु  का प्याला.
मेरे जीवन में बस  था , मदिरालय- मधुरस- प्याला .

साकी ने है मुझे  छला  -   मै ठगा गया मधु के द्वारा , 
घुट  - घुट  कर मै रोता  हूँ,  फूट  रही  अंतरज्वाला.
बर्बादी  को   देख  मेरी है ,  चिढ़ा रही मुझको हाला ,
मेरी लघुता पर हँस हँस कर,  झूम रही है मधुशाला.


तू बड़ी संगिनी है बाला , तू बड़ी रंगिनी है  बाला ,
अनजान प्रेम था कर बैठा , बन गयी कंठ कि है माला .
तू लोक -लाज किसका करती , अरि बेहया-बेशर्म  मधुशाला ,
छू लेती  जब अधरों  को ,है मर जाता पिने वाला .


 जब मदिरालय खाली होगी , उस समय कंहा तू जाएगी ,
प्याले बोतल में पड़ी -पड़ी , अपनी करनी पर रोएगी .
मै मदिरालय से दूर चला ,री भस्म हो जा मधुशाला,
मानव बनने के लिए चला , ठुकराता हूँ तेरा प्याला .  











 




माँ के नाम

जिसकी सुकोमल कोख से यह जन्म पाने के लिए ,
पीकर पायो निधि धार जिसकी यह रूप पाने के लिए ।
हे, ममतामयी -म्रदुभाषणी-मातेंशवरी तुझको नमन ॥